भारतीय राजनीति में पसमांदा, अति पिछड़ी जातियों, महादलितों, और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व न के बराबर है. इनके हको की बात अली अनवर और अन्य गणमान्य जन, बुद्धिजीवी, और आन्दोलनकर्ता आदि लगातार कर रहें थें, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इस और ध्यान नहीं दिया.  इस समाज के वोट लेने की चिंता तो रही लेकिन समुचित प्रतिनिधत्व नहीं दिया गया. न तो टिकट देने में, न पदाधिकारियों में और न हीं राजनीतिक नियुक्तियों में. इसपर कई अध्ययन हो चुकें हैं, खालिद अनीस अंसारी ने इसपर कई डेटा भी प्रकाशित कर चुकें हैं.

इन्हीं परिदृश्यों और पृष्ठभूमि में आज नई दिल्ली में एक बैठक का आयोजन किया गया था जिसमें यह निर्णय लिया गया कि एक नई राजनितिक पार्टी का गठन किया जाए. यह निर्णय ऐसे समय आया है जब देश में लोक सभा चुनाव चल रहें हैं. और कल अर्थात 11 अप्रैल, 2019 को पहले चरण का मतदान है.

यह कहा जा सकता है कि अलग राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा करने में देर हुई लेकिन इससे पहले यह कोशिश की गई कि इसकी नौबत ही न आये. पिछले लोक सभा चुनाव से ही यह मुहीम चल रहा था कि पसमांदा, अति पिछड़े, महादलित, आदिवासी को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलें.  

चुनाव  पहले जिसकी जीतनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात की जाती है, लेकिन चुनाव के समय कहा जाता है, जिसकी जीतनी तैयारी उसकी उतनी हिस्सेदारी. मानो बाकियों  की कोई तैयारी ही नहीं होती.

New Delhi: Ali Anwar will Form New Political Party, अली अनवर नई पार्टी बनायेंगें (Photo Credit: Khalid Anis Ansari) 10 04 2019

पार्टी बनाने की तात्कालिक पृष्ठभूमि और इतिहास भी देखना जरुरी है.

अली अनवर पत्रकार पृष्ठभूमि के हैं, और भारत में पहली बार उन्होंने पसमांदा मुस्लिम की बात  खुल कर की. पटना में पसमांदा पर उनके किताब के विमोचन में नितीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों आएं थें.

बाद में नीतिश कुमार ने उन्हें दो बार राज्य सभा भी भेजा. तब नितीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के साथ थें. बाद में उन्होंने भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया. शरद यादव भाजपा से नाता तोड़ने के खिलाफ थें. खैर बाद में नितीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन करके बिहार विधान सभा चुनाव 2015 जीता. लेकिन लालू परिवार से तंग आकर नीतिश कुमार फिर से भाजपा के साथ चले गए और सरकार बना ली.

इसपर अली अनवर और नितीश कुमार का कहना था कि नितीश कुमार ने इतना बड़ा फैसला लेने से पहले उनसे नहीं पूछा.  दरअसल यह शरद यादव का प्रॉब्लम और अहम् का सवाल था न की अली अनवर का. अली अनवर पहले एक इंटरव्यू में बोल चुकें थें कि वे पार्टी के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करतें हैं. नितीश कुमार उनके नेता हैं. इसलिए यहाँ अली अनवर शरद यादव के कूटनीति के शिकार हो हो गए. नितीश और अली अनवर दोनों कमजोर हुए तथा शरद यादव पूर्व योजना के तहद लालू यादव के साथ हो लिए. यह अकारण नहीं था कि शरद यादव ने कभी भी अली अलवर के चुनाव लड़ने के सवाल पर कुछ नहीं बोला. यह सब उनके पहले ही सोची समझी रणनीति का हिस्सा था.

इन्हीं परिस्थियों में आज 10 अप्रैल, 2019 को एक नई पार्टी के निर्माण का फैसला लिया गया.

नई पार्टी ने निर्माण से भारतीय राजनीति में एक नई शुरुआत हो सकती है, लेकिन यह पार्टी ने नीति कार्य और मिहनत पर निर्भर करेगा. राजनीति में कुछ भी जल्दी या देर नहीं होता। लोक सभा चुनाव अपने परवान पर है, और सकता है यह कुछ असर डाले.