Author: H. L. Dusadh

बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद H. L. Dusadh

बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद पर H. L. Dusadh ने दर्शाया है कि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के एजेंडे के समक्ष छद्म राष्ट्रवाद तिनकों की भांति उड़ जायेगा। उन्होंने भोपाल घोषणापत्र और डाइवर्सिटी मिशन के असर की पर भी विस्तृत चर्चा की है. पढ़े और शेयर करें।

Read More

क्या मायावती कांशीराम के भागीदारी दर्शन का सदव्यवहार करने के लिए आगे बढेंगी H. L. Dusadh

Read More

बहुजन तानाशाही कारण बन सकती है भयावह सापेक्षिक वंचना- एच. एल. दुसाध H L Dusadh

Read More

निजी क्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता समझें- एच. एल. दुसाध

सामाजिक न्याय की लड़ाई ऐसी हो गई कि आरक्षण को सभी समस्यायों का एकमात्र हल के रूप में देखा जाने लगा है. देश के सभी संसाधनों पर सभी का हक़ है इसलिए सबका प्रतिनिधित्व होना चाहिए लेकिन आरक्षण सभी समस्यायों का हल नहीं है। यह कहने की हिम्मत होनी चाहिए। आप पूरा लेख पढ़ें और आलोचनात्मक कमेंट करें। बहस को आगे बढ़ने के लिए इसे शेयर भी करें।

Read More

शर्मसार करती सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल: सामाजिक न्याय की अनदेखी के लिए क्यों अभिशप्त है “मुख्यधारा” की मीडिया!

भारत की भ्रष्ट्र ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल कर रहें हैं एच. एल. दुसाध। वे भाजपा के पक्ष में युद्ध उन्माद की विश्लेषण कर के साथ-साथ इसे राष्ट्रवाद की दृष्टि से भी देख रहें हैं.

Read More

मार्क्सवादी व्याख्या: मूलनिवासियों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण जरुरी! एच. एल. दुसाध

भारत के मूलनिवासियों के समस्याओं और इसके समाधान की मार्क्सवादी व्याख्या कर रहें हैं H L Dusadh Dusadh . यह व्याख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत में मार्क्सवाद की गलत व्याख्या हुई है. इसे सिर्फ वर्ग संघर्ष के रूप में देखा गया है लेकिन सिर्फ मालिक और मजदूर या फिर राज्य और मजदूर के संघर्ष के रूप में. जबकि यह संघर्ष बहुआयामी है जिसमें सांस्कृतिक-सामाजिक पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है.

जबकि मार्कस्वाद संस्कृति और धर्म के भूमिका को भी रेखांकित करता है. यह सांस्कृतिक प्रभाव का भी अध्ययन करता है.

प्रस्तुत लेख में साहूजी, पहले, पेरियार,नरंगुरु और आंबेडकर आदि भारतीय चिंतको के जिक्र के साथ साथ मार्क्सवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में रखता है.

Read More

बहुजनवादी दल को चाहिए कि अनुप्रिया जैसी प्रतिभाओं को सवर्णवादी दलों से जुड़ने से रोक लें- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More

“राष्ट्रवादी लहर” को मलान कर सकता है संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More

देश के संसाधनों और अवसरों पर पहला हक़ मूलनिवासी शोषित वंचित वर्गों का है! -एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More

जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी यह नारा लोक सभा चुनाव 2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

चुनाव में नारो के महत्त्व के साथ-साथ इसके महत्त्व के इतिहास को तथ्यों और उसके प्रभावों के साथ बता रहें हैं एच. एल. दुसाध. चुनाव में नारे उसी तरह काम करतें हैं जैसे विज्ञापन को दो लाइने किसी प्रोडक्ट को जन-जन तक पहुँचा देता है. लेकिन जनता अंतिम निर्णय उसके नारों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कार्यात्मक गुणवत्ता के आधार पर देती है. यहाँ “जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी” के नारे में यह परिभाषित करना होगा कि किसकी संख्या? यह नारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोग ज्यादा प्रयोग करतें हैं. जिसने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के नाम पर जाटव/ चमार को टिकट दिया और दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति वाल्मीकि को न एक भी टिकट लोक सभा चुनाव में दिया न एक भी टिकट विधान सभा में. आज वह समाजवादी पार्टी (सपा) (अखिलेश गुट) के साथ है. समाजवादी पार्टी ने भी समाजवाद या/और पिछड़ेवाद के नाम पर यादववाद किया है. इसलिए यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित नारा सभी जातियों को भी उसके संख्या के हिसाब से चुनाव में टिकट भी दे. साथ ही बसपा और सपा क्रमशः चार-चार यादव और जाटव/ चमार मुख्यमंत्री दे चुकें हैं ऐसे में उनके सम्बन्ध में यह नारा तभी लोगो को सार्थक लगेगा जब वे क्रमशः गैर-यादव और गैर-जाटव/ चमार मुख्यमंत्री भी प्रस्तावित करें. – संपादक, अनिल कुमार

Read More

बहुजनो में आक्रोश पैदा हो: एजुकेशन डाइवर्सिटी के लिए- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More

विभागवार आरक्षण : वर्ग संघर्ष के इतिहास में वंचितों वर्गों पर एक और प्रहार! एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More

क्या तथाकथित द्विज सवर्ण जाति भी आरक्षण के पात्र हो सकते हैं! – एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

Read More
  • 1
  • 2