Category: Debate

भारतीय परम्पराओं को आर्य लेखकों ने विकृत किया: होरी/ होली के विशेष संदर्भ में- सुरेश प्रसाद

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होलिका दहन और सती प्रथा में समानता: इतिहास और पुराण का स्त्रीवादी विश्लेषण- आँचल

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बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद H. L. Dusadh

बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद पर H. L. Dusadh ने दर्शाया है कि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के एजेंडे के समक्ष छद्म राष्ट्रवाद तिनकों की भांति उड़ जायेगा। उन्होंने भोपाल घोषणापत्र और डाइवर्सिटी मिशन के असर की पर भी विस्तृत चर्चा की है. पढ़े और शेयर करें।

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भाजपा और मोदी की 2014 वाले मुद्दों और वायदे की ठसक अब फीकी पड़ गई है- सुरेश प्रसाद

सुरेश प्रसाद, भाजपा – मोदी की सरकार की ठसक के बारे में बता रहें हैं. उन्होंने दर्शाया है कि भाजपा मोदी की ठसक 2014 की तुलना में फीकी हुई है.

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विभाजनकारी लोगो का विभाजनकारी एजेंडा Ravindra Prakash Bhartiya

सवर्ण समाज के मनुवादी विभाजनकारी एजेंडा और इसके इतिहास पर प्रकाश डाल रहें हैं रविंदर प्रकाश भारतीय। यह भी कि कैसे श्रमण संस्कृति पर ब्राह्मणवादी संस्कृति ने शाजिस कर कब्ज़ा जमाया।

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महिला आंदोलन, पितृसत्ता और जाति में सम्बन्ध: एक नया आयाम डॉ. मुखत्यार सिंह

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निजी क्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता समझें- एच. एल. दुसाध

सामाजिक न्याय की लड़ाई ऐसी हो गई कि आरक्षण को सभी समस्यायों का एकमात्र हल के रूप में देखा जाने लगा है. देश के सभी संसाधनों पर सभी का हक़ है इसलिए सबका प्रतिनिधित्व होना चाहिए लेकिन आरक्षण सभी समस्यायों का हल नहीं है। यह कहने की हिम्मत होनी चाहिए। आप पूरा लेख पढ़ें और आलोचनात्मक कमेंट करें। बहस को आगे बढ़ने के लिए इसे शेयर भी करें।

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शर्मसार करती सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल: सामाजिक न्याय की अनदेखी के लिए क्यों अभिशप्त है “मुख्यधारा” की मीडिया!

भारत की भ्रष्ट्र ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल कर रहें हैं एच. एल. दुसाध। वे भाजपा के पक्ष में युद्ध उन्माद की विश्लेषण कर के साथ-साथ इसे राष्ट्रवाद की दृष्टि से भी देख रहें हैं.

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मार्क्सवादी व्याख्या: मूलनिवासियों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण जरुरी! एच. एल. दुसाध

भारत के मूलनिवासियों के समस्याओं और इसके समाधान की मार्क्सवादी व्याख्या कर रहें हैं H L Dusadh Dusadh . यह व्याख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत में मार्क्सवाद की गलत व्याख्या हुई है. इसे सिर्फ वर्ग संघर्ष के रूप में देखा गया है लेकिन सिर्फ मालिक और मजदूर या फिर राज्य और मजदूर के संघर्ष के रूप में. जबकि यह संघर्ष बहुआयामी है जिसमें सांस्कृतिक-सामाजिक पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है.

जबकि मार्कस्वाद संस्कृति और धर्म के भूमिका को भी रेखांकित करता है. यह सांस्कृतिक प्रभाव का भी अध्ययन करता है.

प्रस्तुत लेख में साहूजी, पहले, पेरियार,नरंगुरु और आंबेडकर आदि भारतीय चिंतको के जिक्र के साथ साथ मार्क्सवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में रखता है.

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“राष्ट्रवादी लहर” को मलान कर सकता है संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

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JNU में पिछड़ी – अतिपिछड़ी – पसमन्दा महिलाओं का सम्मेलन 2019: बहुजन महिलाओं का सम्मेलन

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भाजपा सरकार के देशप्रेम का पर्दाफास: शहीद विजय सोरेंगे के आदिवासी होने कारण भेदभाव, उनके नाम पर चौंक का नामकरण करने पर भाजपा पुलिस ने किया गिरफ्तार- द नेशनल प्रेस

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