Category: India

बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद H. L. Dusadh

बहुजन डाइवर्सिटी बनाम छद्म राष्ट्रवाद पर H. L. Dusadh ने दर्शाया है कि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के एजेंडे के समक्ष छद्म राष्ट्रवाद तिनकों की भांति उड़ जायेगा। उन्होंने भोपाल घोषणापत्र और डाइवर्सिटी मिशन के असर की पर भी विस्तृत चर्चा की है. पढ़े और शेयर करें।

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शर्मसार करती सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल: सामाजिक न्याय की अनदेखी के लिए क्यों अभिशप्त है “मुख्यधारा” की मीडिया!

भारत की भ्रष्ट्र ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी मीडिया की भूमिका की पड़ताल कर रहें हैं एच. एल. दुसाध। वे भाजपा के पक्ष में युद्ध उन्माद की विश्लेषण कर के साथ-साथ इसे राष्ट्रवाद की दृष्टि से भी देख रहें हैं.

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मोदी के पटना रैली के पहले राजनीतिक गिरफ्तारीयों का रिहाई मंच ने किया विरोध

रिहाई मंच ने राजनीतिक गिरफ़्तारी और उसके राजनीतिक उपयोग पर सवाल उठाया है. साथ ही इस पर आपत्ति दर्ज की है कि ऐसे कई मामले हैं जब न्यायिक सुनवाई के पहले अन्यायपूर्ण गिरफ़्तारी होती है और ऐसे धाराओं में में गिरफ़्तारी होती है कि उसमें जिंदगी गुजर जाती है.

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मार्क्सवादी व्याख्या: मूलनिवासियों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण जरुरी! एच. एल. दुसाध

भारत के मूलनिवासियों के समस्याओं और इसके समाधान की मार्क्सवादी व्याख्या कर रहें हैं H L Dusadh Dusadh . यह व्याख्या इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत में मार्क्सवाद की गलत व्याख्या हुई है. इसे सिर्फ वर्ग संघर्ष के रूप में देखा गया है लेकिन सिर्फ मालिक और मजदूर या फिर राज्य और मजदूर के संघर्ष के रूप में. जबकि यह संघर्ष बहुआयामी है जिसमें सांस्कृतिक-सामाजिक पक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है.

जबकि मार्कस्वाद संस्कृति और धर्म के भूमिका को भी रेखांकित करता है. यह सांस्कृतिक प्रभाव का भी अध्ययन करता है.

प्रस्तुत लेख में साहूजी, पहले, पेरियार,नरंगुरु और आंबेडकर आदि भारतीय चिंतको के जिक्र के साथ साथ मार्क्सवाद को भारतीय परिप्रेक्ष्य में रखता है.

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बहुजनवादी दल को चाहिए कि अनुप्रिया जैसी प्रतिभाओं को सवर्णवादी दलों से जुड़ने से रोक लें- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

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“राष्ट्रवादी लहर” को मलान कर सकता है संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

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उत्तर प्रदेश का राजनीतिक भविष्य: लोक सभा चुनाव 2019 – तपेंद्र शाक्य, द नेशनल प्रेस

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झारखंड में लोकसभा चुनाव, महागठबंधन और सामाजिक संगठनों तथा जन आंदोलनों की भूमिका- लोक सभा चुनाव 2019

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जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी यह नारा लोक सभा चुनाव 2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

चुनाव में नारो के महत्त्व के साथ-साथ इसके महत्त्व के इतिहास को तथ्यों और उसके प्रभावों के साथ बता रहें हैं एच. एल. दुसाध. चुनाव में नारे उसी तरह काम करतें हैं जैसे विज्ञापन को दो लाइने किसी प्रोडक्ट को जन-जन तक पहुँचा देता है. लेकिन जनता अंतिम निर्णय उसके नारों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कार्यात्मक गुणवत्ता के आधार पर देती है. यहाँ “जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी” के नारे में यह परिभाषित करना होगा कि किसकी संख्या? यह नारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोग ज्यादा प्रयोग करतें हैं. जिसने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के नाम पर जाटव/ चमार को टिकट दिया और दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति वाल्मीकि को न एक भी टिकट लोक सभा चुनाव में दिया न एक भी टिकट विधान सभा में. आज वह समाजवादी पार्टी (सपा) (अखिलेश गुट) के साथ है. समाजवादी पार्टी ने भी समाजवाद या/और पिछड़ेवाद के नाम पर यादववाद किया है. इसलिए यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित नारा सभी जातियों को भी उसके संख्या के हिसाब से चुनाव में टिकट भी दे. साथ ही बसपा और सपा क्रमशः चार-चार यादव और जाटव/ चमार मुख्यमंत्री दे चुकें हैं ऐसे में उनके सम्बन्ध में यह नारा तभी लोगो को सार्थक लगेगा जब वे क्रमशः गैर-यादव और गैर-जाटव/ चमार मुख्यमंत्री भी प्रस्तावित करें. – संपादक, अनिल कुमार

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भागलपुर में बहुजन प्रतिरोध लगातार जारी- सोनम कुमार, द नेशनल प्रेस

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10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण और 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ 7 फ़रवरी 2019 को होगा जोरदार विरोध मार्च और प्रदर्शन- सोनम कुमार, द नेशनल प्रेस

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अतिपिछड़ा समाज ने अपने अधिकार के लिए भरी हुंकार- सोनम कुमार, द नेशनल प्रेस

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