Category: National Discourse

भारतीय परम्पराओं को आर्य लेखकों ने विकृत किया: होरी/ होली के विशेष संदर्भ में- सुरेश प्रसाद

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निजी क्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता समझें- एच. एल. दुसाध

सामाजिक न्याय की लड़ाई ऐसी हो गई कि आरक्षण को सभी समस्यायों का एकमात्र हल के रूप में देखा जाने लगा है. देश के सभी संसाधनों पर सभी का हक़ है इसलिए सबका प्रतिनिधित्व होना चाहिए लेकिन आरक्षण सभी समस्यायों का हल नहीं है। यह कहने की हिम्मत होनी चाहिए। आप पूरा लेख पढ़ें और आलोचनात्मक कमेंट करें। बहस को आगे बढ़ने के लिए इसे शेयर भी करें।

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जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी यह नारा लोक सभा चुनाव 2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

चुनाव में नारो के महत्त्व के साथ-साथ इसके महत्त्व के इतिहास को तथ्यों और उसके प्रभावों के साथ बता रहें हैं एच. एल. दुसाध. चुनाव में नारे उसी तरह काम करतें हैं जैसे विज्ञापन को दो लाइने किसी प्रोडक्ट को जन-जन तक पहुँचा देता है. लेकिन जनता अंतिम निर्णय उसके नारों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कार्यात्मक गुणवत्ता के आधार पर देती है. यहाँ “जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी” के नारे में यह परिभाषित करना होगा कि किसकी संख्या? यह नारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोग ज्यादा प्रयोग करतें हैं. जिसने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के नाम पर जाटव/ चमार को टिकट दिया और दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति वाल्मीकि को न एक भी टिकट लोक सभा चुनाव में दिया न एक भी टिकट विधान सभा में. आज वह समाजवादी पार्टी (सपा) (अखिलेश गुट) के साथ है. समाजवादी पार्टी ने भी समाजवाद या/और पिछड़ेवाद के नाम पर यादववाद किया है. इसलिए यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित नारा सभी जातियों को भी उसके संख्या के हिसाब से चुनाव में टिकट भी दे. साथ ही बसपा और सपा क्रमशः चार-चार यादव और जाटव/ चमार मुख्यमंत्री दे चुकें हैं ऐसे में उनके सम्बन्ध में यह नारा तभी लोगो को सार्थक लगेगा जब वे क्रमशः गैर-यादव और गैर-जाटव/ चमार मुख्यमंत्री भी प्रस्तावित करें. – संपादक, अनिल कुमार

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अतिपिछड़ा समाज ने अपने अधिकार के लिए भरी हुंकार- सोनम कुमार, द नेशनल प्रेस

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जगदेव प्रसाद और राष्ट्रीयता: शैक्षणिक क्षेत्रो का लोकतंत्रीकरण, द नेशनल प्रेस

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क्या तथाकथित द्विज सवर्ण जाति भी आरक्षण के पात्र हो सकते हैं! – एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

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बहुसंख्य आबादी की गुलामी को उजागर करने के लिए याद रहेगा वर्ष 2018 एच. एल. दुसाध डाइवर्सिटी मिशन

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चौधरी चरण सिंह के जयंती पर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा का पूरा भाषण

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प्रतिनिधित्व (आरक्षण) का बँटवारा: प्रतिनिधित्व का लोकतान्त्रिक विस्तार या “घर तोड़ने की साजिश”

“घर तोड़ने की साजिश” की बात पहली बार तब की गई थी जब जब अंग्रेजो ने भारत सरकार अधिनियम के तहद दो वर्गों को सरकारी नियुक्तियों में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) दिया था जिसे अनुसचित जनजाति और अनुसूचित जाति के रूप में पहचान की गई थी. दूसरी बार इसे महात्मा गाँधी आंबेडकर के सामने दुहराते हैं (पुना पैक्ट), तीसरी बार कर्पूरी ठाकुर द्वारा मुंगेरीलाल कमीशन लागु करने के बाद और चौथी बार मंडल कमीशन लागु करने के बाद दुहराया जाता है. आज फिर “घर तोड़ने की साजिश” की बात हो रही है. कनकलता यादव का विश्लेषण पढ़िए और लेख पर आलोचनात्मक कमेंट करें- संपादक

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संविधान का संतुलन बिगड़ गया है, न्यायपालिका तानाशाह हो गई है: 3 दिसंबर, 2018 को न्यायपालिका का घेराव करेंगें डॉ. उदित राज

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अभिवक्ति की आजादी और शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में भगत सिंह छात्र एकता मंच का भूख हड़ताल

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संविधान दिवस पर विशेष: संविधान के उद्देश्यों से खिलवाड़ करने में नरेंद्र मोदी अव्वल

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