Category: Policy

“सवर्ण आरक्षण” के लिए संविधान संसोधन और सामाजिक न्याय के कथित योद्धाओं की भूमिका- विश्वंभर नाथ प्रजापति

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आरक्षण के खिलाफ BHU के मनुवादी आंदोलन से उठते प्रश्न Ravindra Prakash Bhartiya

मनुवादी समानता और सामान अवसर विरोधी क्यों हैं? इसपर रविंद्र प्रकाश भारती न सिर्फ सवाल कर रहें हैं बल्कि इसका विश्लेषण भी कर रहें हैं.

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भाजपा और मोदी की 2014 वाले मुद्दों और वायदे की ठसक अब फीकी पड़ गई है- सुरेश प्रसाद

सुरेश प्रसाद, भाजपा – मोदी की सरकार की ठसक के बारे में बता रहें हैं. उन्होंने दर्शाया है कि भाजपा मोदी की ठसक 2014 की तुलना में फीकी हुई है.

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बहुजन आंदोलन की जीत पर प्रसन्नता और 5 मार्च 2019 के भारत बंद के दौरान मुकदमे और गिरफ़्तारी की निंदा- सोनम कुमार

5 मार्च, 2019 को शोषित वंचित जातियों द्वारा सफल भारत आयोजित किया गया था. लेकिन भारत बंद समर्थको पर फर्जी आरोप लगाकर उनको गिरफ्तार किया गया था. लोगो में इसके प्रति रोष है. साथ ही भारत सरकार द्वारा 7.3.2019 को 13 पॉइंट रिजर्वेशन रोस्टर ख़तम करने के अध्यादेश लाने पर .ख़ुशी भी है,

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बहुजन तानाशाही कारण बन सकती है भयावह सापेक्षिक वंचना- एच. एल. दुसाध H L Dusadh

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निजी क्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता समझें- एच. एल. दुसाध

सामाजिक न्याय की लड़ाई ऐसी हो गई कि आरक्षण को सभी समस्यायों का एकमात्र हल के रूप में देखा जाने लगा है. देश के सभी संसाधनों पर सभी का हक़ है इसलिए सबका प्रतिनिधित्व होना चाहिए लेकिन आरक्षण सभी समस्यायों का हल नहीं है। यह कहने की हिम्मत होनी चाहिए। आप पूरा लेख पढ़ें और आलोचनात्मक कमेंट करें। बहस को आगे बढ़ने के लिए इसे शेयर भी करें।

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“राष्ट्रवादी लहर” को मलान कर सकता है संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

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JNU में पिछड़ी – अतिपिछड़ी – पसमन्दा महिलाओं का सम्मेलन 2019: बहुजन महिलाओं का सम्मेलन

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भाजपा सरकार के देशप्रेम का पर्दाफास: शहीद विजय सोरेंगे के आदिवासी होने कारण भेदभाव, उनके नाम पर चौंक का नामकरण करने पर भाजपा पुलिस ने किया गिरफ्तार- द नेशनल प्रेस

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समाज में शिक्षा और सामाजिक न्याय: शिक्षा का बाजारीकरण और वर्तमान सरकार- अभिषेक आज़ाद

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जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी यह नारा लोक सभा चुनाव 2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

चुनाव में नारो के महत्त्व के साथ-साथ इसके महत्त्व के इतिहास को तथ्यों और उसके प्रभावों के साथ बता रहें हैं एच. एल. दुसाध. चुनाव में नारे उसी तरह काम करतें हैं जैसे विज्ञापन को दो लाइने किसी प्रोडक्ट को जन-जन तक पहुँचा देता है. लेकिन जनता अंतिम निर्णय उसके नारों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कार्यात्मक गुणवत्ता के आधार पर देती है. यहाँ “जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी” के नारे में यह परिभाषित करना होगा कि किसकी संख्या? यह नारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोग ज्यादा प्रयोग करतें हैं. जिसने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के नाम पर जाटव/ चमार को टिकट दिया और दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति वाल्मीकि को न एक भी टिकट लोक सभा चुनाव में दिया न एक भी टिकट विधान सभा में. आज वह समाजवादी पार्टी (सपा) (अखिलेश गुट) के साथ है. समाजवादी पार्टी ने भी समाजवाद या/और पिछड़ेवाद के नाम पर यादववाद किया है. इसलिए यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित नारा सभी जातियों को भी उसके संख्या के हिसाब से चुनाव में टिकट भी दे. साथ ही बसपा और सपा क्रमशः चार-चार यादव और जाटव/ चमार मुख्यमंत्री दे चुकें हैं ऐसे में उनके सम्बन्ध में यह नारा तभी लोगो को सार्थक लगेगा जब वे क्रमशः गैर-यादव और गैर-जाटव/ चमार मुख्यमंत्री भी प्रस्तावित करें. – संपादक, अनिल कुमार

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