Category: Way of Life

भारतीय परम्पराओं को आर्य लेखकों ने विकृत किया: होरी/ होली के विशेष संदर्भ में- सुरेश प्रसाद

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होलिका दहन और सती प्रथा में समानता: इतिहास और पुराण का स्त्रीवादी विश्लेषण- आँचल

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होली कैसे मनाएँ? बुद्धकालीन संस्कृति और परंपरा

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महिला आंदोलन, पितृसत्ता और जाति में सम्बन्ध: एक नया आयाम डॉ. मुखत्यार सिंह

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जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी यह नारा लोक सभा चुनाव 2019 में घटित कर सकता है चमत्कार!- एच. एल. दुसाध, द नेशनल प्रेस

चुनाव में नारो के महत्त्व के साथ-साथ इसके महत्त्व के इतिहास को तथ्यों और उसके प्रभावों के साथ बता रहें हैं एच. एल. दुसाध. चुनाव में नारे उसी तरह काम करतें हैं जैसे विज्ञापन को दो लाइने किसी प्रोडक्ट को जन-जन तक पहुँचा देता है. लेकिन जनता अंतिम निर्णय उसके नारों के आधार पर नहीं बल्कि उसके कार्यात्मक गुणवत्ता के आधार पर देती है. यहाँ “जिसकी जितनी संख्या भारी: उसकी उतनी भागीदारी” के नारे में यह परिभाषित करना होगा कि किसकी संख्या? यह नारा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लोग ज्यादा प्रयोग करतें हैं. जिसने पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के नाम पर जाटव/ चमार को टिकट दिया और दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति वाल्मीकि को न एक भी टिकट लोक सभा चुनाव में दिया न एक भी टिकट विधान सभा में. आज वह समाजवादी पार्टी (सपा) (अखिलेश गुट) के साथ है. समाजवादी पार्टी ने भी समाजवाद या/और पिछड़ेवाद के नाम पर यादववाद किया है. इसलिए यह महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित नारा सभी जातियों को भी उसके संख्या के हिसाब से चुनाव में टिकट भी दे. साथ ही बसपा और सपा क्रमशः चार-चार यादव और जाटव/ चमार मुख्यमंत्री दे चुकें हैं ऐसे में उनके सम्बन्ध में यह नारा तभी लोगो को सार्थक लगेगा जब वे क्रमशः गैर-यादव और गैर-जाटव/ चमार मुख्यमंत्री भी प्रस्तावित करें. – संपादक, अनिल कुमार

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जगदेव प्रसाद और राष्ट्रीयता: शैक्षणिक क्षेत्रो का लोकतंत्रीकरण, द नेशनल प्रेस

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बहुसंख्य आबादी की गुलामी को उजागर करने के लिए याद रहेगा वर्ष 2018 एच. एल. दुसाध डाइवर्सिटी मिशन

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The Socio-Economic Problem of Heavy Expenditure in Indian Marriage Anchal

Anchal is focusing on the thoughts of heavy expenditure and show off in Indian marriage. She is focusing on the Indian mentality and result of the heavy expenditure. As we know that because of this culture many parents have the force to take the loan from the money lender, family, friends and the bank. And the result is these many families are living a life under the loan repayment pressure. This culture is also led to many girls and family in depression. Read and critically comment on the article – Editor

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धर्मसंसद : फिर मांद से निकले साधु-संत

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जन्म आधारित चार वर्णो की प्रचलित व्याख्या पर सवाल: भारतीय सामाजिक व्यवस्था का क्रमिक विकास और वर्ण व्यवस्था

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ग्रीन पटाखे क्या हैं?

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